Author: Ramesh Sharma

पिता

मेरी हजारों खताओं को दरकिनार कर गए।
निश्चिंत रहा जिनके साये में पिता गुजर गए।।

परिवार को संभालने में गुजारी जिंदगी अपनी।
अपने शौक ,खुशियां को दरकिनार कर गए ।।

दुनिया की सब मुश्किलों से उन्होंने उबारा हमें।
हर कदम पर हमारे लिए दीवार बन कर गए।।

मेरी जिंदगी बना दी खुद को खपाकर जिन्होंने।
जीवन ईमानदारी और नेकनीयती में बसर गए।।

किससे करूं शिकायत और किससे सलाह लूं।
जिन्होंने सिखाई दुनियादारी वो कूच कर गए।।

जिंदगी की हकीकत को जाना उनके जाने के बाद।
अपने सत्कर्मों से जगत में अपनी छाप छोड़कर गए ।।

हर एक की जुबान पर चढ़ा रहता था उनका नाम।
वो जाने कितने लोगों के जीवन संवार कर गए।।

अपने हंसमुख स्वभाव और दूसरों की मदद की।
सिर्फ यही कमाई कर हमारे लिए छोड़ कर गए।।

मधुशाला

मंदिर मस्जिद बने मजहब को अलग अलग।
पंडित और मौलवी को मिलाती मधुशाला।।

जीवन जीने के चक्कर में थककर चूर हुआ।
कदम बहकते जा पहुंचे गम भुलाने मधुशाला।।

जाति पांत के झगड़े में ना जाने कितने कत्ल हुए।
सबको साथ बिठा महफ़िल जमाती मधुशाला।।

ना कोई अमीर यहां और ना ही कोई गरीब है।
सब के जाम टकराते मेल कराती मधुशाला।।

घर में दिल घुटता है तो चिंता की बात नहीं।
साथ दोस्तों के मौजमस्ती कराती मधुशाला।।

दिल टूटा तेरा इश्क में माशूका भी छोड़ गई।
सभी लोगों का दिल बहलाती ये मधुशाला।।

उसूलों पे जहां आंच आये

जीवन में कभी ऐसा मौका आए।
कहीं उसूलों पर जहां आंच आए।।
जब मन भी दुविधा में पड़ता जाए।
उस राह से मुंह मोड़ लिया जाए।।

तुमको पैदा किया मात-पिता ने,
उनका सेवा सम्मान किया जाए,
वो साक्षात देवता हैं घर में अपने,
उनका दिल से आशीर्वाद लिया जाए।।

अपने तुच्छ स्वार्थ की खातिर।
चंद सिक्कों में न बिक जाए।।
तुम पर अनैतिकता न हावी हो।
सिद्धांतों की बलि ने चढ़ जाए।।

यह मन हमेशा तुम्हें कचोटेगा।
एक पल न चैन से रहने देगा।।
ईश्वर को क्या मुंह दिखलाओगे।
इस बात का ध्यान रखा जाए।।

पुनरावृत्ति

तुमसे बस यही कहना चाहता हूं,
पुनरावृत्ति न हो खताओं की मेरी।
हर आता से सीखूं सबक मैं नया,
नई राह ऐसी पकड़ना चाहता हूं।।

बहुत कुछ दिया है ऊपर वाले ने,
शुक्रिया अदा करना चाहता हूं।
अगर काम आ जाऊं मैं किसी के,
खुद को ऐसा बनाना चाहता हूं।।

हर मुश्किल आसान हो सकती है,
हौसला मैं ऐसा रखना चाहता हूं।
समय बदल देता है जब राहें,
खुद की नीयत अटल चाहता हूं।।

ज़माना कभी साथ नहीं देता किसी का,
अपने बाजुओं का भरोसा चाहता हूं।
मुझे कामयाबी मिल के रहेगी इक दिन,
खुद को फलक पे देखना चाहता हूं।।

बुजुर्गों का दुख

यह हमारे संस्कारों में कमी,
सिर्फ आधुनिक शिक्षा दे पाए।
थोड़ा जोड़ा होता अपने लिए तो,
क्यों हम आश्रित रह पाए।।

मौत से पहले आजमा लो

खुबसूरत जिंदगी दी है तुम्हें उसने,
हौसलों से मंजिल अपनी पालो।
न बैठो यूं अधर सहारे नसीब के,
मौत से पहले आजमा लो खुद को।।

झुकती आंखों ने बताया

दुनिया भर के दर्दों को सीने में समाया।
मगर झुकती आंखों ने ये राज बताया।।

ग़ैर तो गैर थे अपनों ने भी ठुकराया।
मगर झुकती आंखों ने ये राज बताया।।

नकाब बदलते है

बदल रहा आज मानव स्वरूप ,
छल,कपट, प्रपंच सब करते हैं।
अपने इन कर्मों को छुपाने को,
हर पल नकाब बदलते हैं।।

राम नाम

राम से बड़ा राम का नाम मूरख यह पार लगाएगा।
राम नाम का तू जप ले बंदे फिर पीछे तू पछतायेगा ।।

जैसी करनी वैसी भरनी जग की रीति यही है चलनी।
राम का नाम तू जप ले बंदे फिर पीछे पछतायेगा।।

क्या लेकर तू आया यहां पर और क्या तू ले जायेगा।
राम का नाम तू जप ले बंदे फिर पीछे पछतायेगा।।

भाई बहन मात पिता सुत दारा कोई काम न आयेगा।
राम का नाम तू जप ले बंदे फिर पीछे पछतायेगा।।

महल दोमहले दौलत शौहरत सब यहीं रह जायेगा।
राम का नाम तू जप ले बंदे फिर पीछे पछतायेगा।।

अभी समय सद्गुरु की शरण में जा वो पार लगायेगा।
राम का नाम तू जप ले बंदे फिर पीछे पछतायेगा।।

नाम मंत्र लेकर भजन कर तू भव सागर तर जायेगा।
राम का नाम तू जप ले बंदे फिर पीछे पछतायेगा।।

सबका पालन हार है एक ही सबकी पार लगायेगा।
राम का नाम तू जप ले बंदे फिर पीछे पछतायेगा।।

रमेश शर्मा